नई दिल्ली। देश में बैंकों द्वारा मिनिमम बैलेंस न रखने पर वसूले गए शुल्क को लेकर बड़ा मुद्दा सामने आया है। लोकसभा की याचिका समिति ने अपनी रि...
नई दिल्ली।
देश में बैंकों द्वारा मिनिमम बैलेंस न रखने पर वसूले गए शुल्क को लेकर बड़ा मुद्दा सामने आया है। लोकसभा की याचिका समिति ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि सरकारी और निजी बैंकों ने पिछले वर्षों में ग्राहकों से हजारों करोड़ रुपये वसूले हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, बीते पांच वर्षों में बैंकों ने मिनिमम बैलेंस न रखने पर करीब 11,000 करोड़ रुपये तक की वसूली की। इसमें निजी बैंकों द्वारा एक वर्ष में लगभग 2,772 करोड़ रुपये वसूले जाने का उल्लेख है, जबकि सरकारी बैंकों ने पांच वर्षों में करीब 8,600 करोड़ रुपये की राशि वसूली।
साल-दर-साल बढ़ती वसूली
सरकारी बैंकों में वसूली की राशि लगातार बढ़ती रही:
- 2020-21: ₹1,148.71 करोड़
- 2021-22: ₹1,415.65 करोड़
- 2022-23: ₹1,785.90 करोड़
- 2023-24: ₹2,225.10 करोड़
- 2024-25: ₹2,045.74 करोड़
यह आंकड़े दर्शाते हैं कि बैंकिंग प्रणाली में ग्राहकों पर शुल्क का बोझ लगातार बढ़ा है।
समिति की तीन प्रमुख सिफारिशें
1️⃣ मिनिमम बैलेंस नियम खत्म करने की सिफारिश
समिति ने सुझाव दिया है कि बचत खातों में न्यूनतम शेष राशि (Minimum Balance) की अनिवार्यता समाप्त की जाए, ताकि आम ग्राहकों पर आर्थिक बोझ कम हो।
2️⃣ बैंक शुल्क में पारदर्शिता
बैंकों को अपने सभी शुल्क — जैसे एसएमएस अलर्ट, एटीएम उपयोग, डिजिटल लेनदेन शुल्क — स्पष्ट रूप से बताने की सिफारिश की गई है।
3️⃣ शिकायत निवारण की समय-सीमा
ग्राहकों की शिकायतों के समाधान के लिए अधिकतम तीन कार्यदिवस की समय-सीमा तय करने का प्रस्ताव रखा गया है।
राज्यों में वसूली का आंकड़ा
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कुछ राज्यों में वसूली की राशि उल्लेखनीय रही।
- राजस्थान में लगभग ₹440 करोड़
- मध्यप्रदेश में ₹427 करोड़
क्या है आगे का रास्ता?
समिति ने बैंकिंग प्रणाली में सुधार और उपभोक्ता हितों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने पर जोर दिया है। अब निगाहें सरकार और वित्त मंत्रालय के अगले निर्णय पर टिकी हैं।
