उत्तर प्रदेश में प्राकृतिक खेती को लेकर सरकार की पहल अब ज़मीन पर असर दिखाने लगी है। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 94,300 हेक्टेयर से अध...
उत्तर प्रदेश में प्राकृतिक खेती को लेकर सरकार की पहल अब ज़मीन पर असर दिखाने लगी है। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 94,300 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर प्राकृतिक और जैविक खेती की जा रही है। यह विस्तार न केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर रहा है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में भी सकारात्मक संकेत दे रहा है।
🌾 किसानों को कैसे मिल रहा लाभ?
- लागत में कमी: प्राकृतिक खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों की जगह गोबर, गौमूत्र, जीवामृत जैसे पारंपरिक संसाधनों का उपयोग किया जाता है, जिससे उत्पादन लागत घटती है।
- मिट्टी की सेहत बेहतर: लगातार रासायनिक उपयोग से खराब हो रही मिट्टी की उर्वरता में सुधार देखा जा रहा है।
- बाज़ार में बढ़ती मांग: जैविक उत्पादों की मांग शहरों और निर्यात बाज़ार में तेजी से बढ़ रही है, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं।
📍 बुंदेलखंड पर विशेष फोकस
सरकार ने विशेष रूप से बुंदेलखंड क्षेत्र में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया है, क्योंकि यह इलाका सूखा और जल संकट से प्रभावित रहा है। प्राकृतिक खेती कम पानी में भी बेहतर परिणाम देती है, इसलिए यहां इसे “गेम-चेंजर” माना जा रहा है।
🚜 सरकार की योजनाएँ
- प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से किसानों को तकनीकी जानकारी दी जा रही है।
- क्लस्टर आधारित मॉडल लागू किया गया है, जिससे गांव-स्तर पर सामूहिक खेती को बढ़ावा मिल रहा है।
- जैविक उत्पादों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग के लिए विशेष सहायता योजनाएं चलाई जा रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रफ्तार बनी रही, तो आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में देश का अग्रणी राज्य बन सकता है।
