हाल ही में भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald ...
रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता Maria Zakharova ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत की ओर से तेल खरीद नीति में किसी बड़े बदलाव की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है। उन्होंने अमेरिकी दावों को “भरोसे के न काबिल” बताते हुए कहा कि भारत और रूस के बीच ऊर्जा सहयोग पारस्परिक हितों पर आधारित है और यह वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता लाने में सहायक है।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से पश्चिमी देशों, विशेषकर United States ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। इसके बावजूद भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल खरीदना जारी रखा है। भारत का रुख शुरू से ही स्पष्ट रहा है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का रूस से तेल आयात पूरी तरह बंद करना व्यावहारिक रूप से कठिन है, क्योंकि रूस वर्तमान में भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में से एक है। हालांकि हाल के महीनों में आयात आंकड़ों में कुछ उतार-चढ़ाव जरूर देखा गया है, लेकिन इसे पूरी तरह “खरीद बंद” कहना जल्दबाजी होगी।
कूटनीतिक स्तर पर यह मामला भारत के संतुलित विदेश नीति दृष्टिकोण को भी दर्शाता है। भारत एक ओर अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर रूस के साथ पारंपरिक संबंधों और ऊर्जा सहयोग को भी बनाए रखने के पक्ष में है।
रूस की आधिकारिक प्रतिक्रिया के अनुसार भारत ने रूसी तेल आयात रोकने का कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया है। यह विवाद अधिकतर राजनीतिक बयानों और अंतरराष्ट्रीय दबाव की पृष्ठभूमि में उभरा है। आने वाले समय में भारत की ऊर्जा नीति और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ इस मुद्दे की दिशा तय करेंगी।
