नई दिल्ली / गाज़ियाबाद: भारत की न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला देते हुए Supreme Court of India ने गाज़ियाबाद के एक यु...
नई दिल्ली / गाज़ियाबाद: भारत की न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला देते हुए Supreme Court of India ने गाज़ियाबाद के एक युवक को “राइट टू डाई विद डिग्निटी” (सम्मान के साथ मृत्यु का अधिकार) की अनुमति दे दी है। अदालत ने चिकित्सकों को मरीज का लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति देते हुए कहा कि जब किसी व्यक्ति के स्वस्थ होने की कोई संभावना नहीं हो और वह वर्षों से असहाय स्थिति में हो, तो ऐसे मामलों में प्राकृतिक मृत्यु की प्रक्रिया को होने देना मानवीय दृष्टि से उचित हो सकता है।
गाज़ियाबाद के निवासी हरिश राणा वर्ष 2013 में एक गंभीर दुर्घटना का शिकार हो गए थे। इमारत से गिरने के कारण उन्हें गंभीर ब्रेन इंजरी हुई, जिसके बाद से वह लगातार कोमा जैसी स्थिति में थे। डॉक्टरों के अनुसार वे पिछले कई वर्षों से “परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट” में थे और उनकी हालत में सुधार की कोई संभावना नहीं थी।
परिवार के सदस्यों ने अदालत में याचिका दाखिल कर यह मांग की थी कि लगातार कृत्रिम जीवन-समर्थन (लाइफ सपोर्ट) पर निर्भर मरीज को सम्मानपूर्वक मृत्यु का अधिकार दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें Justice J. B. Pardiwala और Justice K. V. Viswanathan शामिल थे, ने मेडिकल रिपोर्ट और परिस्थितियों का अध्ययन करने के बाद Passive Euthanasia (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी।
अदालत ने कहा कि जब उपचार केवल जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने तक सीमित हो और मरीज के ठीक होने की कोई संभावना न हो, तो ऐसे मामलों में डॉक्टरों और परिवार को मानवीय निर्णय लेने की अनुमति दी जा सकती है।
Passive Euthanasia में मरीज को जानबूझकर मारने के लिए कोई दवा नहीं दी जाती। इसके बजाय लाइफ सपोर्ट या कृत्रिम चिकित्सा सहायता को हटाया जाता है, जिससे व्यक्ति की मृत्यु प्राकृतिक रूप से हो जाती है।
यह फैसला भारत में “राइट टू डाई विद डिग्निटी” की बहस को एक बार फिर चर्चा में ले आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए कानूनी दिशा-निर्देश तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी संकेत दिया है कि इस विषय पर स्पष्ट और व्यापक कानून बनाने पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसे संवेदनशील मामलों में स्पष्ट प्रक्रिया और नियम तय हो सकें।
