भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश माना जाता है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया को कहा जाता है, क्योंकि मीडिया का काम जनता और सरकार के ...
पहले मीडिया का उद्देश्य सच दिखाना, जनता की आवाज उठाना और सरकार से सवाल पूछना होता था। पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर भ्रष्टाचार उजागर करते थे। लेकिन आज का एक बड़ा हिस्सा TRP, विज्ञापन और राजनीतिक फायदे के लिए काम करता दिखाई देता है। कई बड़े मीडिया संस्थान सत्ता के करीब रहकर सिर्फ सरकार की तारीफ करते हैं और जनता के असली मुद्दों को दबा देते हैं।
देश में बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे गंभीर मुद्दे पीछे छूट जाते हैं, जबकि टीवी चैनलों पर धर्म, जाति, फिल्मी विवाद और बेकार की बहसें दिखाई जाती हैं। जनता का ध्यान असली समस्याओं से हटाकर भावनात्मक मुद्दों में उलझा दिया जाता है। इससे सरकार पर जवाबदेही का दबाव कम हो जाता है और भ्रष्टाचार बढ़ने लगता है।
जब मीडिया सरकार से सवाल पूछना छोड़ देता है, तब सरकार भी धीरे-धीरे निरंकुश बनने लगती है। लोकतंत्र में विपक्ष जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी स्वतंत्र मीडिया भी है। लेकिन अगर मीडिया सिर्फ सरकार का प्रचारक बन जाए, तो जनता तक सच्चाई पहुंच ही नहीं पाती। यही कारण है कि कई बार बड़े घोटाले, गलत नीतियां और जनता विरोधी फैसले बिना किसी विरोध के लागू हो जाते हैं।
सोशल मीडिया के दौर में भी फर्जी खबरें और प्रोपेगेंडा तेजी से फैलाए जाते हैं। कई चैनल और पोर्टल बिना तथ्य जांचे खबरें चलाते हैं। इससे समाज में नफरत और भ्रम फैलता है। आम जनता धीरे-धीरे सच और झूठ में फर्क करना भी भूल जाती है।
हालांकि आज भी देश में कई ईमानदार पत्रकार और स्वतंत्र मीडिया संस्थान मौजूद हैं, जो सच दिखाने का साहस रखते हैं। लेकिन उन पर दबाव, मुकदमे और आर्थिक संकट लगातार बढ़ रहे हैं। लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए जरूरी है कि मीडिया निष्पक्ष और स्वतंत्र रहे।
अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर मीडिया बिकाऊ हो जाए, तो भ्रष्टाचार और तानाशाही दोनों तेजी से बढ़ते हैं। जागरूक जनता, स्वतंत्र पत्रकारिता और सही जानकारी ही लोकतंत्र को बचा सकती है। जनता को भी चाहिए कि वह आंख बंद करके किसी चैनल या खबर पर विश्वास न करे, बल्कि हर जानकारी को समझदारी और तथ्यों के आधार पर परखे।
