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न्याय का दोहरा मापदंड कब तक?

देश में आज सबसे बड़ी चिंता केवल अपराध नहीं है, बल्कि न्याय के प्रति समाज का बदलता हुआ दृष्टिकोण भी है। ऐसा प्रतीत होता है कि कई लोग घटनाओं क...

देश में आज सबसे बड़ी चिंता केवल अपराध नहीं है, बल्कि न्याय के प्रति समाज का बदलता हुआ दृष्टिकोण भी है। ऐसा प्रतीत होता है कि कई लोग घटनाओं का मूल्यांकन संविधान और कानून के आधार पर नहीं, बल्कि जाति और वैचारिक पहचान के आधार पर करने लगे हैं।

मेरठ में पुलिस हिरासत के दौरान एक व्यक्ति के साथ कथित मारपीट का वीडियो सामने आया। यदि कोई व्यक्ति पुलिस की हिरासत में है, तो उसके साथ कानून के विरुद्ध बल प्रयोग का विरोध होना चाहिए। इसी प्रकार बिहार में भारत तिवारी मुठभेड़ मामले में भी सवाल उठे और निष्पक्ष जांच की मांग की गई।
हमारा स्पष्ट सिद्धांत है—कानून सबके लिए समान होना चाहिए।
यदि पुलिस किसी व्यक्ति के साथ हिरासत में दुर्व्यवहार करती है, तो उसका विरोध होना चाहिए, चाहे वह किसी भी जाति या समुदाय का हो। यदि किसी पुलिस मुठभेड़ पर संदेह है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, चाहे मारा गया व्यक्ति किसी भी वर्ग से संबंधित हो।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि समाज का एक हिस्सा हर घटना को जातीय चश्मे से देखने लगता है। जब पीड़ित अपनी जाति का होता है, तब मानवाधिकार और संविधान की बातें होती हैं; लेकिन जब पीड़ित दूसरी जाति का होता है, तो वही लोग चुप्पी साध लेते हैं या अपना रुख बदल लेते हैं। यही दोहरा मापदंड समाज को कमजोर करता है।
हमने भारत तिवारी प्रकरण में भी यही कहा था कि यदि उन्होंने आत्मसमर्पण किया था या पुलिस कार्रवाई पर संदेह है, तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। और यदि मेरठ में पुलिस हिरासत में किसी व्यक्ति के साथ अनुचित व्यवहार हुआ है, तो उसका भी विरोध होना चाहिए। हमारा पक्ष किसी जाति का नहीं, बल्कि न्याय, संविधान और मानवाधिकार का है।
भारत का संविधान किसी नागरिक का मूल्य उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके नागरिक होने के आधार पर तय करता है। इसलिए न्याय भी जाति देखकर नहीं, कानून देखकर होना चाहिए।
यदि हम सचमुच एक न्यायपूर्ण भारत चाहते हैं, तो हमें हर मामले में एक ही सिद्धांत अपनाना होगा—न अपराधी की जाति देखी जाए, न पीड़ित की; केवल तथ्य, कानून और संविधान सर्वोपरि हों।
न्याय का एक ही पैमाना होना चाहिए—संविधान।